सावन सोमवार के साथ ही हरियाली अमावस्या के पवित्र मौके पर जानिए प्रसिद्ध आस्थास्थल डोबरा महादेव के बारे में...। शहर के पास तारागढ़ की पहाड़ियों में ऐसा रमणीय और रहस्यमयी स्थल है कि इसे जानकर आप रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। धोक के पेड़ों के घनघोर जंगल के बीच स्थित डोबरा महादेव के मंदिर की स्थापना 700 साल पहले बताई जाती है।
यहां पंचमुखी महादेव के अलावा रघुनाथजी और बालाजी की मूर्तियां स्थापित हैं। रियासतकाल में यह संतों का मठ रहा। घनघाेर जंगल में इस मठ में संत तपस्या करते थे। यहां पानी का डाबरा (बावड़ीनुमा कुंड) है, जिस पर इसका नाम डोबरा महादेव पड़ा।
रामगढ़ टाइगर सेंचुरी का हिस्सा है जंगल
यह जंगल रामगढ़ टाइगर सेंचुरी का हिस्सा है। जंगल इतना घना है कि शिकारी जानवर से सामना हो जाए तो बचकर भागा भी नहीं जा सकता। घनघोर जंगल में आज भी पैंथर, रीछ, सियार सहित कई जंगली और शिकारी जानवर रात में घूमते रहते हैं। कभी बाघ भी दहाड़ें मारते थे, क्योंकि घनघोर जंगल में केवल डोबरा महादेव में ही वाटर प्वाइंट है। धोकड़े के घने जंगल बेशकीमती हैं, जो थोड़ी सी बरसात में हरे-भरे हो जाते हैं। धोकड़े की लकड़ियां काफी कीमती होती हैं, इसे नवफुटान का जंगल भी कहा जाता है।
सावन में भरता है मेला, कोरोना काल में नहीं भरा
मंदिर के महंत ओमप्रकाश (ओमदास) बताते हैं कि यहां मठ था, संत तप करते थे। यहां पंचमुखी महादेव, बालाजी, भगवान रघुनाथ की मूर्ति स्थापित है। बताया जाता है कि बालाजी की मूर्ति गायों की बछड़ियों के गोबर से बनाकर स्थापित की गई। बूंदी दरबार ने 24 तीर्थों से जल मंगवाकर कुंड स्थापित किया। सावन की पहली अष्टमी को मेला भरता है, जिसमें हजारों लोग जाते हैं, पर पहली बार कोरोना संकट के चलते मेला नहीं भरा। हर सोमवार और विशेषकर सावन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु डोबरा महादेव दर्शन करने जाते हैं। यहां एक संत की जीवित समाधि भी है।
1 किमी जंगलों से होकर जाता है रास्ता
डोबरा महादेव जाने का प्रमुख रास्ता दलेलपुरा से बाईं ओर पहाड़ी पर टीवी टावर के पास से जाता है। टीवी टावर तक पक्की सड़क है। करीब एक किमी तक पहाड़ों-घने जंगलों से होकर जाना पड़ता है। मंदिर से जनवरी 2016 में रात को भगवान रघुनाथ (चारभुजाजी) की काले पत्थर की बेशकीमती मूर्ति भी चोरी हो गई थी। जो करीब पांच-छह सौ साल पुरानी बताई जाती है। चोर मूर्ति तोड़कर ले गए, पर मूर्ति के पंजे व पायल मंदिर में ही रह गए। बाद में मूर्ति बरामद हो गई, लेकिन खंडित हाल में मिली।
बूंदी नरेशों की रणनीति का हिस्सा, पहाड़ी दर्रे में छिपा
पुरातत्ववेत्ता ओपी कुकी बताते हैं कि डोबरा महादेव बूंदी नरेशों की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा रहा। यह स्थल घनघोर जंगलों में निर्जन जगह पर पहाड़ी दर्रे में इस तरह छिपा है कि पास जाने के बाद ही पता चलता है कि यहां कोई स्थल भी है। हमलावर सेना को इस जगह का पता नहीं चल पाता था कि यहां सेना है।
बूंदी की फौज में नागा साधु भी सैनिक थे। यह गुप्त और रहस्यमयी स्थान है। महंत बताते हैं कि कभी बूंदी के गढ़ को जीतने के लिए इसी दर्रे से होकर दुश्मन की सेना गढ़ तक पहुंच गई थी। दुश्मनों को डोबरा का नाला नजर नहीं आता। बूंदी के राजाओं ने दर्रे में नागा साधु सैनिकों के लिए मठ बना दिया।
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